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Sunday, April 25, 2021

जाति और राजनीति




जाति और राजनीति लोकतांत्रिक परिप्रेक्ष्य में परस्पर विरोधी है और इस विरोधिता का आधार इनकी मौलिक मान्यताओं, आधारभूत मूल्यों एवं सामाजिक सरोकारों के सिद्धांतों में परस्पर टकरावों को माना जा सकता है।

           जहाँ लोकतंत्र बहुआयामी विस्तृतता को मानवीय मूल्यों के साथ जोड़कर सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक रूप से समानता और समावेशन का पक्षधर है, वहीं जाति व्यवस्था अपने-आप में संकीर्णता और वर्ग विभेदिता की परिचायक है। जाति के आधार पर ही विभिन्न कुल समूह की अस्मिता एवं कर्तव्यों का निर्धारण किया जाता है, जिससे समानता के सिद्धांत के विपरीत स्तरीय विघटनकारी प्रभाव उत्पन्न होते हैं।

           प्रजातंत्र एवं जाति की अवधारणाओं का प्रथम पटाक्षेप समानता के बिंदु पर ही होता है। जहाँ प्रजातंत्र धर्म, जाति, लिंग एवं किसी भी प्रकार के अ-प्राकृतिक मानवीय भेदभाव के विरुद्ध मानवीय मूल्यों पर आधारित समावेशी समानता का समर्थन करता है, वहीं जाति स्वयं ही स्तरीय कार्यात्मक एवं विभेदात्मक असमानता को जन्म देती है।

         प्रजातंत्र की विशेषताओं में स्वतंत्रता, न्याय की समानता की संकल्पना एवं बुद्धिमत्तापूर्ण तार्किक विश्लेषण का अग्रिम स्थान होता है, किंतु जाति स्वतंत्रता के बजाय एक निषेधात्मक प्रवृत्ति है, जिसमें खानपान एवं कर्तव्यों हेतु प्रतिबंधात्मक विचारों को अपनाया जाता है। इसी प्रकार प्रजातंत्र में न्याय की संकल्पना तार्किकता एवं समानता के बिंदु से ही सम्बद्ध होती है, किन्तु जातीय अवधारणा न्याय हेतु इन दोनों बिंदुओं की परिपूर्णता पर असमर्थ होती है, जिसमें तार्किकता के बजाए कठोरता एवं जड़ता को स्थान दिया जाता है।

       इतनी विरोधिता के पश्चात भी इन व्यवस्थाओं को साथ रखते हुए भारत ने स्वयं को जनसांख्यिकीय और सैद्धांतिक रूप से दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में स्थापित किया है, जो भारत की विशिष्ट सफलता को प्रदर्शित करता है। हालांकि, भारत में राजनीतिक दलों का निर्माण एवं इनका चुनावी प्रचार-प्रसार भी जाति आधारित होता है। चुनावों में उम्मीदवारों के चयन के सामान्य प्रवृत्ति एवं विधान मंडलों में भी आरक्षण भी जाति आधारित ही है।

           किन्तु, इन सभी अंतर्विरोधों के पश्चात भी वर्तमान में जैसे-जैसे लोकतंत्र परिपक्व होता जा रहा है, वैसे-वैसे जातिगत व्यवस्था एवं मुद्दों को समावेशी विकास समतामूलक मानवता के द्वारा प्रतिस्थापित किया जा रहा है, जो भारत को जातिगत प्रजातंत्र के विश्लेषण से ऊपर उठाकर वह वैकासिक एवं मानवीय प्रजातंत्र के रूप में विश्व पटल पर स्थापित करेगा।

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