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Saturday, July 17, 2021

भारत में दलितों की स्थिति - दलित व्याख्यान

 


बाबा साहब का अनुदेश था - पढ़ो, लिखो और संघर्ष करो । आज हम सभी के सामने प्रस्तुत यह विवरणिका उसी पठन-लिखन एवं संघर्ष की एक अप्रतिम मिसाल है । किंतु इन सबके विपरीत यदि किसी समाज में किसी दुष्कर्म पीड़ित बेटी को न्याय अर्जित करने की राह में हत्यारों द्वारा अपने परिवार की हत्या होते हुए देखना पड़े तब उस समाज में गुंडों की ताक़त और गरीबों और मजलूमों की हालत का अंदाजा लगाना ज्यादा मुश्किल नहीं है । यह समाज की एक त्रासदी है, दुःखदायी है, किंतु सत्य है और इस त्रासदी को खत्म करने का जिम्मा किस पर है, इस पर सिर्फ़ एक बहस खडी करने की ज़रूरत नहीं बल्कि एक-एक व्यक्ति को विचार एवं शक्ति के समायोजन का प्रचंड उदाहरण रखने की ज़रूरत है ।

समय गुजरा है, पीढ़ियाँ बदली है लेकिन स्थितियाँ जस की तस हैं। बाबा साहब अम्बेडकर के सपनों की आजादी में ऐसा समाज तो नहीं था कि हमें खेतों में फसलों के बजाय दुष्कर्म पीड़ित बच्चियों की लाशें बरामद हो या फिर भट्टों पर काम करने वाले मजदूरों की बेटियों के साथ गुंडों द्वारा बंदूक की नौंक पर बलात्कार कर लिए जाएँ । आख़िर बाबा साहब के सपनों की आज़ादी का समाज इस देश के किन नस्ल एवं जातिवादी गलियारों में संघर्ष कर रहा है, उसके बारे में सोचना भी त्रासदीपूर्ण है ।

NCRB डाटा 2019 के अनुसार भारत में रोज़ 10 दलित महिलाओं एवं बच्चियों के बलात्कार हो रहे हैं । कितना दुःखदायी है कि पिछले 6 वर्षों में यह आंकड़ा 6 से बढ़कर 10 हो गया । किस जगह की बात करूँ मैं, उन्नाव, अलीगढ़, मिर्जापुर, रामपुर, हाथरस । उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, हरियाणा और कौन से राज्य का नाम लूँ । रोज़ जाने कितनी दलित बच्चियों को इन दानवों के द्वारा अपनी हवस का शिकार बनाया जा रहा है । इसके लिए अगर देश की सत्ता में बैठे लोग खुश होना चाहें तो हो सकते हैं लेकिन इस देश के दलित इस स्थिति को न तो स्वीकार करेंगे और न ही कभी भूलेंगे ।

क्या समाज में ऐसी घटनाएं सिर्फ ताकत दिखाने का एक जरिया है? नहीं साहब! यह एक कलुषित मानसिकता है, जो लोगों के दिमाग में जड़ तक भरी हुई है । यह मानसिकता है कमजोर को एक वस्तु समझने की । यह मानसिकता है, गरीबों और मजलूमों के ऊपर हुए अत्याचारों के इतिहास की । यह मानसिकता है कमजोर को कमजोर बनाये रखने की ताकि ग़ुलामों की संख्या में बढ़ोतरी की जा सके और क्या यह मानसिकता सिर्फ़ आपराधिक तत्वों तक सिमटी हुई है ? नहीं साहब! इस मानसिकता के पैर हर उस व्यक्ति के दिमाग में फैले हुए हैं, जिसने इस समाज में स्व-श्रेष्ठता का एक आडंबर रच रखा है । फिर चाहे वह कितना ही पढ़ा लिखा हो या अनपढ़ या फिर सामाजिक-राजनीतिक रूप से कितने ही बड़े पद पर हो या फिर जाति का घमंड लेकर बैठा हो ।

महिलाओं पर हुए अत्याचारों का इतिहास इतना छोटा नहीं है कि हमारी सोच भी वहाँ तक पहुंच सके । हमारी सोच से भी परे कई गहराइयों तक इनके घावों के दर्द का परिमाप फैला हुआ है । ये घाव और इनके साथ किए जाने वाले भेदभाव क्या सिर्फ दुष्कर्मों तक सीमित है ? नहीं साहब ! चाहे वह शिक्षा हो, राजनीति हो, नौकरियाँ हो, सामाजिक सम्मान हो या फिर नेतृत्व देने की बात हो, हर जगह इनके साथ एक दूरी बना ली जाती है ।

दलित महिलाओं की स्थिति तो तीन तरफ से पहाड़ियों के बीच घिरी एक खाई की तरह नजर आती है । जाति, वर्ग और लिंग के तिहरे भेदभावों का तंज झेलती दलित महिलाएँ रोज़ किसी न किसी तरह के उत्पीड़न का शिकार हो रही हैं । फिर चाहे वह देवदासी प्रथा हो, मैला ढोने की प्रथा हो या फिर बंधुआ मजदूरी हो, हम कहाँ-कहाँ गुलामी की इन जड़ों को नहीं देख रहे हैं ।

बाबा साहब की विचार सम्मति थी कि “इंसान सिर्फ समाज के विकास के लिए नहीं पैदा हुआ है, बल्कि स्वयं के विकास के लिए पैदा हुआ है” । किंतु क्या हम बाबा साहब के इस विचार को 21वीं सदी में भी सफल बना पाये? भारत में यदि दलित महिलाओं की प्रगति एवं विकास के सामान्य संकेतकों - शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य, भूमि एवं सम्पत्ति अधिकार और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के आँकड़े देखें जाये तो एक बड़ी ही दुःखद स्थिति उभर कर आती है । ये आंकड़े सभी पुरुषों, दलित पुरुषों एवं अन्य जाति की महिलाओं की तुलना में दलित महिलाओं की दयनीय स्थिति की तस्वीर सामने रखते हैं ।

किसी समाज की प्रगति को मापने के लिए बाबा साहब का मानना था कि उस समाज में महिलाओं में महिलाओं की प्रगति के प्रतिमानों को नाप लिया जाये । आज भी भारत में दलित महिलाओं की पूरी जनसंख्या के आधे से भी कम महिलाएं पढ़ी-लिखी हैं (43.6%)। लगभग आधे (51%) दलित बच्चे प्राथमिक शिक्षा भी पूरी नहीं कर पाते जबकि इनमें भी लगभग 67% दलित लड़कियां है । हमारे समाज के लिए यह आंकड़ा कितना अचंभित करने वाला है कि 21वीं सदी में भी हमारी केवल 18.2% दलित बेटियाँ ही उच्च शिक्षा में नामांकन करवा पा रही है अर्थात आज भी हमारी लगभग 82% बेटियाँ ऐसी है जो उच्च शिक्षा तक भी पहुंच पा रही है । यह सिर्फ़ विस्मयकारी ही नहीं बल्कि हम सब के लिए एक शर्मनाक आंकड़ा भी है ।

आजादी से आज तक राजनीतिक पार्टियों के द्वारा किए गए बड़े-बड़े दावे, कैसे दलित महिलाओं तक आते-आते शून्य हो जाते हैं, इसका एक उदाहरण आपके सामने रखता हूँ । आज भी हमारी लोकसभा में 78 महिला सदस्यों में से केवल 12 महिलाएं ही दलित हैं । वहीं राज्यसभा में 25 महिला सदस्यों में से केवल एक महिला दलित है । यह हमारे देश में दलित महिलाओं की राजनीतिक स्थिति है । 

पिछले 5 वर्षों में दलित महिलाओं के बलात्कार की घटनाओं में 56.11% की वृद्धि हुई है, हमले की घटनाओं में 43.86% जबकि छेड़छाड़ की घटनाओं में लगभग 155% की बढ़ोतरी हुई है । क्या कोई इन स्थितियों पर गर्व कर सकता है । नहीं साहब! यह स्थितियाँ मांग करती है अब नए बदलाव की । नई सोच की और नए काम की । नए नेतृत्व की, नए आंदोलन की और यह नया आंदोलन खड़ा होगा हम सबके मिलने से । नया आंदोलन खड़ा होगा, हम सबके संकल्प से और जब तक यह पूरा आंदोलन खड़ा नहीं हो जाता, तब तक ज़रूरत है एक नए संघर्ष की शुरुआत की । वही संघर्ष जिसके लिए बाबा साहब अंबेडकर ने अपना पूरा जीवन लगा दिया। बाबा साहब के सपनों की उस आजादी पाना हमारा मकसद है, जिस आजादी में न्याय हमेशा समानता के विचार को पैदा करता है और यह मक़सद बाबा साहब के आशीषों से ही पूरा होगा ।

जय भीम!

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